नहीं जानता मेरी कोशिश गद्य लेखन की थी या पद्मांश की या फिर प्रस्तुत लेख को संस्मरण का रुप देने की पर एक छोटी सी कोशिश की है एक विशेष वर्ग में प्रताड़ित हो रही या यूँ कहें एक नर्क सी ज़िंदगी व्यतीत कर रही महिला के मन की पीड़ा को शब्द देने की.! अब मैं सफल हुआ या नहीं इसकी समीक्षा तो आप सब ही कर सकते हैं, हाँ पर यह निवेदन आप सभी से जरूर करूंगा कि इसे आप सब एक बार जरूर पढ़े..!! मजबूरी...!! बहुत मुश्किल होता है किसी ऐसे सच को स्वीकार करना जो सिर्फ आपसे और आपके व्यक्तित्व से जुड़ा हो और जो कड़वा भी हो और आपको दर्द भी देता हो,मेरे लिए भी एक सच ऐसा था जिसे स्वीकार करना मुश्किल हीं नहीं पीड़ादायक भी था फिर भी स्वीकार कर रखा था मैंने कि मैं एक नाचने वाली की बेटी हूँ जिसे आप सभी अपनी भाषा में "बार डांसर" कहते हैं.! मेरी माँ शहर के एक बड़े डांस बार में नाचा करती थी,और मेरे बाबा जो रोज शाम होते ही दारू के नशे में चूर हो कर कहीं लुढके रहते थे मेरे जन्म के दो महीने बाद ही मर गयें थें,तब से मेरी माँ ने मुझे आप सभी के बीच नाच गा कर ही पाला था ऐसा मेरी माँ बोलती थी! बचपन में जब मैं मुहल्ले ...
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