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Showing posts from March, 2018

नारी...

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"नारी" चलो खत्म हुआ एक भ्रम भरा दिन एवं इस भ्रम भरे दिन के साथ खत्म हुआ शाब्दिक प्रताड़ना, शाब्दिक प्रताड़ना इसलिए कि कल दिन भर पुरूष और नारी दोनों ने ही शब्दों के तरह तरह के प्रहार झेले और पुनः फिर सबकुछ,सबलोग अपने अपने स्थान पर आ गयें.। सभी ने बढ़ चढ़कर नारी दिवस मनाया, आपार हर्ष एवं प्रफुल्लित से मनाया गया यह एक दिन का पर्व कल सभी के मन मस्तिष्क एवं सोसल मिडिया पर छाया रहा पर सोचने और मनन करने योग्य प्रश्न यह है कि ऐसा करने से  क्या सबकुछ सुधर गया या फिर आगे नहीं होगा.। कल "नारी दिवस" पर बहुत से पोस्ट पढने को मिलें,कई तो ऐसे मानो कल से किसी नारी के साथ कुछ गलत नहीं होने वाला,ऐसा लगा कि एक ही दिन में सब कुछ सुधर गया,और कई ऐसे भी जिसे पढ कर मन प्रफुल्लित हो गया,कोई अबला,कोई शक्ति,कोई सृष्टि,तो कोई ईश्वर की अनुपम कृति और ना जाने क्या क्या नामों से अपने पोस्ट या लेखों में नारी का संबोधन कर रहे थें पर जाने क्यों उनसे भी सिर्फ कोरी भावनाएं मात्र की दुर्गंध आ रही थी,ऐसा नहीं कि जिन्होने लिखा या पोस्ट किया बिना किसी भावना के किया पर मेरा सिर्फ यही कहना है कि,क्या सच ...
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यूँ तो एकाकीपन हर किसी को दर्द देता है पर तन्हाई सच में क्या होती है कभी उस अकेले शख्स से पूछिए जो अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर अपने साथी के लिए तड़प रहा होता है. नेपथ्य में जीवन व्यतीत करता एकांत शिथिल किसी कोने में पड़ा हर सफर में साथ चलने वाले हमसफर को उसकी निगाहें ढूँढती रहती है अक्सर.। कभी कभी उसका यह एकाकीपन उसका जीना इतना दुष्कर कर देता है कि किसी शांत निर्जन कोने में छिपकर वह अकेला शख्स अश्रु बहाता घुट घुट कर जीवन के साथ प्रतिक्षण मरता रहता है.आज कुछ इसी तरह एकाकी जीवन व्यतीत करते उम्र के अंतिम पड़ाव पर स्वयं से लड़ते एक अकेले इंसान के मन की व्यथा को शब्द देनें की कोशिश..!! एकाकीपन..!! कहाँ हो ? देखो न..!! इसबार भी होली यूँ ही बीत गई बेरंग उदास हर बार की तरह इस बार भी मैं इंतजार ही करता रहा तुम्हारे रंग में रंगने का तुम न कहा करती थी कि देखना एक दिन ऐसे रंग में रंग दोगी तुम मुझे जो जीवन भर छुड़ाये न छूटेगी सच कहती थी तुम शायद ये विरह वेदना के रंग पीछा ही नहीं छोड़ रहें मेरा उम्र के इस पड़ाव पर भी जाने क्यूँ एकाकीपन के साये में अक्सर घुटता रहता हूँ मैं तुम्हारे बि...
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खाली पेट...!! कभी कभी सोचता हूँ ईश्वर ने आदमी को पेट क्यूँ दिया ? और दिया तो खाली पेट क्यूँ दिया भरा क्यूँ नहीं ? प्रश्न मन में यह भी उठता है कि,चलो माना ईश्वर ने आदमी को खाली पेट दिया सही किया मगर खाली पेटवालों को भूख,लाचारी के साथ किसी के आगे मजबूरी में टेकने वाले घुटनें और फैलाने वाला हाथ क्यों दिया ? पर मेरी सोच और मेरे प्रश्न मेरे मनमस्तिक में जस के तस यथावत विचरण करते मिलते हैं मुझे..!! जब देखता हूँ आदमी को कीड़े मकोड़े की तरह फुटपाथ पर रेंगते हुए और देखता हूँ रोटी के एक निवाले के लिए आदमी को जानवर बनते हुए या फिर देखता हूँ जिंदा होकर भी किसी मुर्दा सा पल पल मरते हुए  जिसकी भूख से आँते सिकुड़ कर छोटी हो गईं हो जैसे और दिमाग आ गया हो नजदीक बिल्कुल पेट के उसके,क्योंकि उस समय उसका पेट ही उसका दिमाग हो जाता है जो उसके खाली पेट को कचरे की ढेर से बीन कर सड़ा गला खाना खाने पर मजबूर कर रहा होता है.। शायद इसलिए कि उस समय आदमी इस स्थिति में नहीं होता कि वह सोच सके कि वह क्या खा रहा है क्या पी रहा है बस होता है तो उसका "खाली पेट" जिसकी आग इतनी जोरों पर होती है कि वह उसे ही ...