विदाई..।
विदाई.....!! इस बार जब मैं घर लौटा तो बाबू जी थोड़े बूझे बूझे लगें मुझे,बस यह सोचकर कि उम्र का प्रभाव हो सकता है चरण वंदन किया और घर के अंदर प्रवेश कर गया.! पत्नी हमेशा की तरह हाथ में तौलिया लिए बरामदे में पानी के साथ खड़ी थी,हाथ मुह धोया और वहीं पास बिछी चारपाई पर बैठ गया.! पर बार बार मेरी नजर बाबू जी के ही तरफ चली जा रही थी जो व्हीलर पर बैठे जाने किस सोच में डूबे थे.! सच कहूँ तो अब एक अजीब सी बेचैनी और चिंता मुझ पर और मेरे मन मस्तिष्क में हावी हो रही थी,ऐसा कभी भी नहीं हुआ था कि मैं घर लौटा हूँ और बाबू जी ने मेरा हाल चाल या मुझसे कुछ पूछा न हो पर इसबार वो बिल्कुल शांत थे.! मुझसे रहा नहीं गया मैं उठकर बाबू जी के पास गया और उनके पास बैठ उनका पैर दबाने लगा.! अपने ही ख्यालों में गुम बाबूजी मेरा स्पर्श पा कर एका एक चौंक गयें..!! मैंने उनसे पूछा क्या बात है बाबा आप इतने बेचैन से क्यूँ दिख रहें हैं ? तबीयत ठीक है न कोई परेशानी तो नहीं ? बाबू जी ने कहा नहीं बेटा कोई परेशानी की बात नहीं.! मैंने फिर पूछा - कहीं बहू ने तो कुछ नहीं कह दिया या फिर बच्चें ? अरे नहीं ऐसी कोई बात नहीं....