मानसिकता
कहते हैं कि ”इंसान" अपने विचारों से निर्मित प्राणी है,वो जैसा सोचता है वैसा बन जाता है.सोच हमारे व्यक्तित्व को चहुँ ओर से प्रभावित करती है.क्षेत्र चाहे कोई भी हो,देश हो,समाज हो,परिवार हो या हमारा आम जीवन,हमारी सोच का हमारी "मानसिकता" पर बहुत असर पड़ता है.।
"मानसिकता" जो हमारे विचारों को दिशा और रूप देती है.! "मानसिकता" लोगों के सोचने का तरीका,लोगों का नजरिया,और उनके संचार एवं संस्कार की संस्कृति.!! या यूँ कहें कि कोई व्यक्ति कैसे खुद को इसमें या किसी और को देखता है या उसका क्या और कौन सा व्यवहार आदर्श माना जाता है.अर्थात्,मानसिकता किसी व्यक्ति या समूह की एक जटिल छवि और उसका व्यक्तिगत परिचय है,आमतौर लोगों की मानसिकता समय समय पर विभिन्न कारकों से प्रभावित होती है.।
कभी कभी हमें हमारी सोच हमें या आपको,एक दूसरे की नजरों में इतना नीचे गिरा देती है जहां से उठ पाना संभव नहीं होता खास कर आज जिस तरह से महिलाओं एवं लड़कियों के प्रति आम लोगों का नजरिया देखने को मिलता है चिंतनीये ही नहीं निंदनीय भी है, पर देखा जाये तो हमारा गलत नजरिया ही हमारी गलत सोच और गंदी मानसिकता का उत्पत्ति करता है जिससे आये दिन छेड़खानी और बलत्कार जैसे जघन्य अपराधों में वृद्धि हो रही है और शायद हम में से किसी को पता भी नहीं कि यह कहाँ जा कर रूकेगी,अतः यह हम पर निर्भर करता है कि हम क्या सोचते हैं,कैसा सोचते हैं,क्या देखते हैं,क्या समझते हैं सब हम पर निर्भर करता है..हाँ सब कुछ,मैं यहाँ यह भी कहना चाहता हूँ कि ऐसा भी नहीं कि हर पुरूष गलत है या हर नारी सती सावित्री बस आवश्यकता है हम अपनी सोच को बदलें,अपनी मानसिकता को बदलें.।
आज एक कोशिश की है नारी के मन से पुरूष मानसिकता को दर्शाने की किन्तु इसका एक दूसरा पहलू भी है जिसे किसी दिन आप सभी के बीच ले कर आऊंगा...!!
"मानसिकता"
हाँ,कल देखा था मैंने तुम्हें
उसी मोड़ पर
जहाँ मिल जाते हो तुम अक्सर
अपने कुछ दोस्तों के साथ
हाँ,कल सुना था मैंने तुम्हें
कुछ कह रहे थे तुम
नारी और उसकी
आत्मा के खुलेपन पर
मगर सच कहूँ तो
हँसी आती है मुझे
जब तुम "मर्द" कहते हो
मेरे कपड़े आज इतने छोटे क्यों ?
मेरा तन आज इतना खुला क्यों ?
नारी..!! हाँ मैं "नारी"
तरस आता है मुझे
जब उठाते हो तुम अपनी
गंदी उंगलियों को मेरी ओर
मेरी पवित्रता और मेरी
आत्मा के स्वच्छ होने पर
यह जानकर भी
कि जब जब तुम लोग
मुझ नारी पर उंगली उठाते रहे हो
पवित्र होकर ही निकली हूँ
हर अग्नि वेदी से मैं..!!
हाँ मैं "नारी" मेरी वस्त्रों का
मेरी उम्र से कोई रिश्ता नहीं
और ना ही प्रश्न है इन्हें मेरे पहनने से
प्रश्न मेरे नारित्व या मेरी पवित्रता का भी नहीं
सवाल तुम्हारी ओछी मानसिकताओं
और तुम्हारे खोखले आदर्शों का है
मैं तो बस एक "नारी" थी
पर मुझे औरत बनाया तुमने
मैं तो बस किसी की बेटी थी
मुझे लड़की बनाया तुमने
कभी तुम्हारी जरुरत बनी मैं
कभी अपनी जरूरत के लिए
न जाने किस किस रूप में
मुझे ढाला तुमने
जाने क्या क्या खोजा मुझमें
जाने क्या क्या चाहा मुझसे
पर तुम मर्द कभी सोचा है तुमने
क्यों होता है ऐसा ?
जब अपनी काम पिपासा
भरी नजरों से बेधते रहते हो तुम
मेरे खुले अधखुले अंगों को अक्सर
और जब कभी रेंग जाती है उंगलियाँ तुम्हारी
राह चलते साँप बन कर मेरे नाजुक अंगो पर
या फिर जब तुम अपनी
कथित आत्मा के सामने खड़े
अपनी ही पशुता की चरम सीमा को
लाँघ देते हो और तार तार हो जाता है
मेरी अस्मिता के साथ तुम्हारा वजूद भी
मेरे इन्हीं छोटे छोटे कपड़ो की तरह
तब तो स्वयं को छोटा नहीं समझते तुम
और ना ही तुम और तुम्हारी आत्मा
गंदी होती है उस वक्त
हाँ पर मैं जरूर रह जाती हूँ
बस कसमसाकर खड़ी
जर्बत किसी बुत की तरह
यह सोचते हुए कि आज तो
मेरे कपड़े छोटे न थें
आज तो मैं पूरी तरह
स्वच्छ हो कर ही घर से निकली थी
फिर मुझ पर ही सवाल क्यों
और यही तुम्हारे गंदे समाज की
गंदी नजरों के सवाल
जो बेध देते है सम्पूर्ण नारी के व्यक्तित्व को
सच कहूँ तो मन में क्षोभ के साथ
आक्रोश भी होता है उस वक्त
और सोचती हूँ आज कौन छोटा
मेरे "कपड़े" या तुम्हारी "मानसिकता"
हाँ शायद तुम्हारी "मानसिकता"
विनोद सिन्हा "सुदामा"
स्वरचित-५/१२/२०१७
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