खाली पेट...!!
कभी कभी सोचता हूँ ईश्वर ने आदमी को पेट क्यूँ दिया ? और दिया तो खाली पेट क्यूँ दिया भरा क्यूँ नहीं ? प्रश्न मन में यह भी उठता है कि,चलो माना ईश्वर ने आदमी को खाली पेट दिया सही किया मगर खाली पेटवालों को भूख,लाचारी के साथ किसी के आगे मजबूरी में टेकने वाले घुटनें और फैलाने वाला हाथ क्यों दिया ? पर मेरी सोच और मेरे प्रश्न मेरे मनमस्तिक में जस के तस यथावत विचरण करते मिलते हैं मुझे..!!
जब देखता हूँ आदमी को कीड़े मकोड़े की तरह फुटपाथ पर रेंगते हुए और देखता हूँ रोटी के एक निवाले के लिए आदमी को जानवर बनते हुए या फिर देखता हूँ जिंदा होकर भी किसी मुर्दा सा पल पल मरते हुए जिसकी भूख से आँते सिकुड़ कर छोटी हो गईं हो जैसे और दिमाग आ गया हो नजदीक बिल्कुल पेट के उसके,क्योंकि उस समय उसका पेट ही उसका दिमाग हो जाता है जो उसके खाली पेट को कचरे की ढेर से बीन कर सड़ा गला खाना खाने पर मजबूर कर रहा होता है.। शायद इसलिए कि उस समय आदमी इस स्थिति में नहीं होता कि वह सोच सके कि वह क्या खा रहा है क्या पी रहा है बस होता है तो उसका "खाली पेट" जिसकी आग इतनी जोरों पर होती है कि वह उसे ही अंदर अंदर निगलती प्रतीत होती है और आदमी इस डर से कि वह इस खाली पेट का ग्रास न बन जाये उसे जो मिलता है खाना शुरू कर देता है यहाँ तक नाले का पानी और लाखो लाख की संख्या मे मंडराते छोटे छोटे कीड़े मकोड़े भी उस सड़े गले खाने के साथ उसके खाली पेट के ग्रास बन जाते हैं.।
"खाली पेट"- आँखों से आँसू आ जाते हैं उस समय जब देखता हूँ कि कैसे,भूख से रोता बिलखता बच्चा तड़प तड़प कर दम तोड़ रहा होता है और उसकी हर एक साँस के बदले उसकी मजबूर अभागन माँ अपनी दूध विहीन छाती और आत्मा विहीन जिस्म का सौदा कर किसी के हवस को पूर्ण कर रही होती है ताकि दूध के दो बूँद इंतजाम कर सके वह अपने बच्चे के लिए जिसे उसके पेट ने भूख की आग में जलाकर कुपोषीत सा कर दिया है और जीकर भी तील तील मर रहा है.।
"खाली पेट"- आत्मा तड़प उठती है उस वक्त जब देखता हूँ किसी अस्पताल मे किसी खटिये पर पड़ा बिना माँस ,प्राण हीन किसी कंकाल की तरह आदमी अपनी गली सिकुड़ी धमनियों में बचे खुचे खून के बूँदों को बेच रहा होता है ताकि घर पर अपनी टूटती फूटती साँसों से लड़ती बूढ़ी विधवा माँ,भूख से तड़पते अपने बच्चों और उन्हें झूठी दिलासा देती हुई अपनी पत्नि जो कब की मर चुकी है के पेट की आग को शांत कर सके.।
"खाली पेट"- जब सोचता हूँ मैं यह सब तो पुनः अंतर ढूँढने लगता हूँ "पेट" और "खाली पेट" में और फिर वही सवाल वही प्रश्न सामने आ जाता है मेरे कि ईश्वर ने आदमी को पेट क्यों दिया और दिया तो खाली पेट क्यों दिया..फिर सोचता हूँ मैं भी कहाँ अछूता हूँ इस प्रश्न से, पास मेरे भी तो एक पेट है "खाली पेट".हाँ खाली पेट जिसे भरने के लिए रोज मैं अपनी थोड़ी थोड़ी साँसों को बेच कर इस खाली पेट या यूँ कहें इस पापी पेट की ज़िंदगी खरीदता हूँ.। हाँ खाली पेट कहें या पापी पेट...प्रश्न वही है
पेट क्यों दिया.????
विनोद सिन्हा "सुदामा"
दिनांक-२८/०२/१८

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