यूँ तो एकाकीपन हर किसी को दर्द देता है पर तन्हाई सच में क्या होती है कभी उस अकेले शख्स से पूछिए जो अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर अपने साथी के लिए तड़प रहा होता है. नेपथ्य में जीवन व्यतीत करता एकांत शिथिल किसी कोने में पड़ा हर सफर में साथ चलने वाले हमसफर को उसकी निगाहें ढूँढती रहती है अक्सर.। कभी कभी उसका यह एकाकीपन उसका जीना इतना दुष्कर कर देता है कि किसी शांत निर्जन कोने में छिपकर वह अकेला शख्स अश्रु बहाता घुट घुट कर जीवन के साथ प्रतिक्षण मरता रहता है.आज कुछ इसी तरह एकाकी जीवन व्यतीत करते उम्र के अंतिम पड़ाव पर स्वयं से लड़ते एक अकेले इंसान के मन की व्यथा को शब्द देनें की कोशिश..!!

एकाकीपन..!!

कहाँ हो ? देखो न..!!
इसबार भी होली
यूँ ही बीत गई
बेरंग उदास हर बार की तरह
इस बार भी मैं
इंतजार ही करता रहा
तुम्हारे रंग में रंगने का
तुम न कहा करती थी
कि देखना एक दिन
ऐसे रंग में रंग दोगी तुम मुझे
जो जीवन भर छुड़ाये न छूटेगी
सच कहती थी तुम शायद
ये विरह वेदना के रंग
पीछा ही नहीं छोड़ रहें मेरा
उम्र के इस पड़ाव पर भी
जाने क्यूँ एकाकीपन के साये में
अक्सर घुटता रहता हूँ मैं
तुम्हारे बिना चेहरे की झुर्रीयों में
मुस्कान भी कहीं गुम हो गई है शायद
तुम्हारी कमी महसूस हो रही है मुझे
मेरा अकेलापन थकाता रहता है मुझको
और मन की व्यथा कभी कभी
रुक जाती है आके अधरों पर
क्योंकि मेरी तन्हाई मुझपर ही
हँसती रहती है अक्सर
देखो न हर ओर होली की उमंग है
सब रंगों की रंगोली में सरोवर हैं
ऐसे में तुम बिन मैं
घर के आँगन की तपती पर
मीठी दोपहरी में खाट पे बैठा
अपने खुद से अंजान
खुद के चेहरे में ही
तुम्हारे स्पर्श को खोज रहा हूँ
इस एकाकी में
यादों की पुरानी बातें भी
अब कोई प्रभाव नहीं छोड़ती
उम्र का असर हो शायद
बूढा हो गया हूँ न
हाथ में लाठी लिए बैठ बगीचे में
सुख-दुख के पंखे झलता
बस तुम्हें सोचता रहता हूँ
हम दोनों के क़िस्सों की कहानी
बुन-बुन कर खुद ही सुनता
और खुद को ही सुनाता रहता हूँ
हाँ देख चुका हूँ जीवन के सब रंग
बन बैठा हूँ अब पतझड़ सा
अब तो हर रोज हर ओर
चकाचोंध है छाया रहता
कभी घर में दिवाली है होती
कभी होती है होली अक्सर
पर आज भी इस भीड़ भाड़ में
हर शोर में,हर आहट में
मैं अब भी तुम्हें ही ढूँढता हूँ
तुम्हें ही खोजता हूँ
आज भी अक्सर
इस गली से उस मोड़ तक
नज़रे जा-जा कर लौट आती हैं
कि शायद तुम नजर आ जाओ कहीं
पल पल तुमको जीता हूँ
तिल तिल सोच तुम्हें मरता हूँ
और सच कहूँ तो आज भी
हर बेबसी का मैं अपनी
दोष तुम पर ही मढ़ता हूँ
क्यों चली गई तुम छोड़ मुझको
आ जाओ कि एक बार फिर मैं तुम्हारे
उस निश्छल निस्वार्थ प्रेम के रंग में
खुद को रंगना चाहता हूँ
हाँ तुम्हारे उस निश्छल निस्वार्थ
प्रेम के रंग में मैं फिर से
खुद को रंगना चाहता हूँ

विनोद सिन्हा "सुदामा"
०३/०३/१८

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