नारी...

"नारी"

चलो खत्म हुआ एक भ्रम भरा दिन एवं इस भ्रम भरे दिन के साथ खत्म हुआ शाब्दिक प्रताड़ना, शाब्दिक प्रताड़ना इसलिए कि कल दिन भर पुरूष और नारी दोनों ने ही शब्दों के तरह तरह के प्रहार झेले और पुनः फिर सबकुछ,सबलोग अपने अपने स्थान पर आ गयें.।
सभी ने बढ़ चढ़कर नारी दिवस मनाया, आपार हर्ष एवं प्रफुल्लित से मनाया गया यह एक दिन का पर्व कल सभी के मन मस्तिष्क एवं सोसल मिडिया पर छाया रहा पर सोचने और मनन करने योग्य प्रश्न यह है कि ऐसा करने से  क्या सबकुछ सुधर गया या फिर आगे नहीं होगा.।

कल "नारी दिवस" पर बहुत से पोस्ट पढने को मिलें,कई तो ऐसे मानो कल से किसी नारी के साथ कुछ गलत नहीं होने वाला,ऐसा लगा कि एक ही दिन में सब कुछ सुधर गया,और कई ऐसे भी जिसे पढ कर मन प्रफुल्लित हो गया,कोई अबला,कोई शक्ति,कोई सृष्टि,तो कोई ईश्वर की अनुपम कृति और ना जाने क्या क्या नामों से अपने पोस्ट या लेखों में नारी का संबोधन कर रहे थें पर जाने क्यों उनसे भी सिर्फ कोरी भावनाएं मात्र की दुर्गंध आ रही थी,ऐसा नहीं कि जिन्होने लिखा या पोस्ट किया बिना किसी भावना के किया पर मेरा सिर्फ यही कहना है कि,क्या सच में आज के परिवेश में भी "नारी" एक मुद्दा होनी चाहिए?क्या उसे हर पल कटघरे में खड़ा रखना चाहिए? शायद नहीं,जहाँ तक मैं समझता हूँ ,सबसे पहले तो "नारी" कोई "मुद्दा" होनी ही नहीं चाहिए और अगर है भी तो इतना संवेदनशील नहीं जितना इसे कुछ लोंगो ने बना दिया है,बुरा तो तब लगता है जब सिर्फ दिखावे के लिए हम "नारी' का अपनी भावनाओं के उस सीमा पर आकलन करने लगतें या व्यक्त करने लगतें हैं जो हम वास्तव मे सोचतें ही नहीं,घर में तो माँ,पत्नी या किसी और रूप को वह ईज्जत दे नहीं पातें और बाहर अपनी सोच का बखान करते रहतें है.एक दिन सर पर बिठा लेतें है और दूसरे ही दिन पांव तले.हमे इससे बाहर आना होगा.। नारी की ईज्जत करनी है तो दिल से करो,शब्दों और सिर्फ कोरी भावनाओं से नहीं.दिखावे से कभी भी किसी नारी का उत्थान नहीं हो सकता.चाहे रूप कोई हो,मै तो समझता हूँ नारी क्या किसी पुरूष के साथ भी यही लागू होता है.।

और हाँ आप नारी ये जो हर जगह हर समय स्वयं को असहाय,दुर्बल का राग अलापती और रोना रोती रहती हो आप इससे बाहर आओ,आप नारी को हम पुरूष कभी भी,कहीं भी कम नहीं आकतें,हाँ कुछ अपवाद हो सकते हैं जो आप नारियों मे भी हैं.मगर सच यही है कि यह आप स्वयं हैं जो स्वयं को अबला, कमजोर और निरीह बनाए रहती हैं,और हाँ आप नारी यह ध्यान रखें कि कोई भी पुरूष या मर्द आपको आपकी सहमति या आपके स्वीकृति के बिना स्वयं से कम नहीं आंक सकता.।सच मानिये आपके सहमति के बिना दुनिया की कोई भी ताकत आपको नीचा नही गिरा सकती। जरूरत है तो बस इस बात को समझने की आप स्वयं एक शक्ति हो और आप नारी की शक्ति है आपके स्वयं की आत्म शक्ति..जब तक आप स्वयं यह नहीं समझती या मान लेतीं कि सिर्फ आज ये नारी दिवस ही नहीं हर दिन हमारा है,हर साल हमारा है, हर वक्त हमारा है,हर दिन,हर वक्त आप यूँ ही कुंठित मन से जियेंगी,आप पूरी ज़िंदगी बस यही सोचती रहेंगी कि आपका जन्म एक अभिषाप है। बाकी जैसा आप नारी उचित समझें आप सब समझदार हैं और जो जैसी हैं सब ठीक ही हैं.।ः

विनोद सिन्हा "सुदामा"

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