सब चलता है..!!

प्रेम,एहसास,मुहब्बत,अनुभव..,बड़े अजीब से शब्द हो गये हैं आजकल,जिनका आज हकीकत से कुछ लेना देना नहीं रहा शायद,आप सभी कहेंगे ये मैं क्या कह रहा हूँ और यही सोच रहे होंगे या तो मैंने अपनी दिमागी शक्ति खो दी है या मुझे इन बातों की समझ नहीं रही पर जो मैं आज आप सभी से कहने या साझा करने जा रहा हूँ,हो सकता है पढकर आप सभी सहमत भी हो और हो सकता है आप सभी में से किसी ने अनुभव भी किया हो.।

कहते है प्रेम आँखों में रहता
और दिल में पलता है और
एहसास को समझता और
एहसास को जीता है मगर
प्रेम को कहाँ पता चलता है
कि हर राह पर,हर बार उसे
उसका "प्रेम" ही छलता है.!!

जो "प्रेम" कभी सिर्फ "प्रेम" था "एहसास" था,और सबके दिलों में एक अंकुर बन कर बसता था आज वृहद रूप ले चुका है,उसकी सोच, उसकी आकांक्षाएं बड़ी हो गयी है.। जिसके बारे में कहा जाता था कि यह तो बस "एक कोमल एहसास" है जो नुमाया होती है दो रूहों के दरमियाँ" सच कहें तो आज के परिवेश में इसके मायने बदल गये हैं और शायद रुप भी या कह सकते हैं कि आज "प्रेम" सिर्फ आकर्षण मात्र बन कर रह गया है .। प्रेम ऐसे तो अमृत था लेकिन आज विष में ढल गया है.। आज हम सभी बदलाव के उस पड़ाव पर खड़े हैं जहाँ से प्रेम हमें सिर्फ एक क्षणिक आवेग नजर आता है,बस सोचा और कर लिया जिस किसी से "प्रेम" - ना उम्र देखी न जात देखी,ना देश देखा न भेष देखा,बस बह गयें एक अंधी दौड़ में,एक बदलाव के बयार में.। कभी न रूकने,,कभी न खत्म होने वाली बयार जो बहे जा जारी है जाने किस रफ्तार से जिसका ना कोई ओर है ना कोई छोर.। हाँ यह सच है कि प्रेम का कोई रूप नहीं होता,प्रेम का कोई रंग नहीं,प्रेम माँ से भी हो सकता है प्रेम बेटी से भी हो सकता है,प्रेम भाई से भी हो सकता है,प्रेम पिता से भी हो सकता है बस प्रेम को देखने का नजरिया अलग होना चाहिए और प्रेम को समझने की समझ जुदा.। पर आज ज्यादा तर लोग इस सच को समझ नहीं पा रहें...और इस अभाषी दुनिया की तो क्या कहें कहाँ जा रहे हैं हम समझ नहीं आता..मान लो आप या हम या कोई और दो घड़ी के लिए ऑनलाइन हैं तभी हमारे या आपके या किसी और के मेसेंजर या इनबॉक्स में किसी के द्वारा भेजा एक प्यारा सा संदेश देखने को मिलेगा कि हाय..कैसी/कैसे हो...? क्या कर रही/रहे हो..?.शादीशुदा हो या...और न जाने कैसे कैसे सवाल.। बस आप उसके या उनमें से किसी एक सवाल का जवाब दें दें फिर तो समझ लें आप ने मुसीबत मोल ली,आपका एक जवाब आपकी हामी हो गयी वह उसके लिए प्रेम हो गया,सुखद एहसास हो गया,.भले उसे आपकी उम्र या आपका प्रोफाइल नहीं पता हो पर आप या हम  सामने वाले के लिए कब उसका "प्रेम" बन जाते है पता नहीं चलता,हो सकता है आप पचास की हों और वह बीस का हो या मैं तीस का और वह साठ की हो.पर समझाया किसे जाय और कहे भी तो क्या कहें.उन्हें यह नहीं पता होता कि सामने वाली उसकी माँ के समान या उसकी माँ की उम्र की है या वो जिसे कोई प्यार का नाम दे रही है उसके बेटे या भाई के उम्र का भी हो सकता है.।और अगर इनको हम,आप या कोई समझाने की कोशिश भी करे तो कहेंगे "सब चलता है" ।.यही सब चलता है हमें आज जितना आगे ले जा रहा है उतना ही पीछे ढकेल रहा है...और आज इसी बदलाव को बदलने की आवश्यकता है अगर मैं गलत नहीं...।।

हमे प्रेम और "प्रेम में सब चलता है" में अंतर ढूँढना होगा, समझना होगा वो अंतर जो हम पहले सोचते थें प्रेम को लेकर या वो एहसास जो हम पहले "प्रेम" के लिए महसूस करते थें..बाकी तो सबका भला करे राम..जो हैं सोचते कि "सब चलता है"


एक आबोध बालक

विनोद सिन्हा "सुदामा"

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